चांद नज़र नहीं आया, रविवार को होगा पहला रोज़ा

Category धर्म

सऊदी अरब में रमजान का महीना शनिवार से शुरू

दिल्ली.शिया चाँद समिति के अध्यक्ष मौलाना सैफ़ अब्बास और मरकज़ी चाँद समिति के अध्यक्ष मौलाना खालिद रशीद फिरहंगीमहली ने चाँद न दिखने की तस्दीक़ की है. रमज़ान माह की पहली तारीख 28 मई को होगी.ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के उपाध्यक्ष डॉ. कल्बे सादिक़ ने कुछ दिन पहले एक बयान में कहा था कि 28 मई को रमज़ान की पहली तारीख होगी और इस तरह ईद 26 जून को मनाई जाएगी. सऊदी अरब में रमजान का महीना शनिवार से शुरू होगा. इस हिसाब से देखें तो हिन्दुस्तान में पहला रोज़ा 28 मई से रखा जाएगा.रमजान नौवां महीना है। ये बरकतों और फजीलतों का महीना है. इसी माह-ए-मुबारक में आसमानी किताब कुरआन नाज़िल हुई थी।तौरेत, जुबूर, इंजील और दूसरी आसमानी किताबें भी इसी माह-ए-मुबारक में उतारी गईं। रमजान महीने का कुरान-ए-मुकददस से गहरा रिश्ता है.
हदीस शरीफ में है कि रमजान में ही हजरत मोहम्मद मुस्तफा सल्लललाहो अलैहे वसल्लम अपने सहाबियों के साथ कुरआन-ए-पाक का दौर (एक-दूसरे को कुरआन सुनाना) किया करते थे.माना जाता है कि रमजान के पाक महीने में जन्नत के दरवाजे खोल दिए जाते हैं। इसलिए इस माह में किए गए अच्छे कामों का सवाब कई गुना ज्यादा बढ़ जाता है और ऊपर वाला अपने बंदों के अच्छे कामों पर नज़र करता है। उनसे खुश होता है।
कहते हैं कि माहे रमज़ान में दोज़ख़ यानी नर्क के दरवाजे बंद कर दिए जाते हैं। रमजान में अल्लाह से अपने सभी गुनाहों की माफी मांगी जाती है। महीने भर तौबा के साथ इबादतें की जाती हैं और माहे रमजान में नफिल नमाजों का सवाब फर्ज के बराबर माना जाता है। साथ ही फर्ज़ नमाजों का सवाब बढ़ जाता है।
http://rpstransit.com/news/riverdale-park-station-shuttle-stop-has-moved/ रोज़े का मक़सद
रोज़े को अरबी में सोम कहते हैं, जिसका मतलब है रुकना। रोज़ा यानी तमाम बुराइयों से रुकना या परहेज़ करना। ज़बान से ग़लत या बुरा नहीं बोलना, आँख से ग़लत नहीं देखना, कान से ग़लत नहीं सुनना, हाथ-पैर तथा शरीर के अन्य हिस्सों से कोई नाजायज़ अमल नहीं करना। किसी को भला बुरा नहीं कहना। हर वक़्त ख़ुदा की इबादत करना।रोज़े का असल मक़सद है कि बंदा अपनी ज़िन्दगी में तक्वा ले आए। वह अल्लाह की इबादत करे और अपने नेक आमाल और हुस्ने सुलूक से पूरी इंसानियत को फ़ायदा पहुँचाए। अल्लाह हमें कहने-सुनने से ज़्यादा अमल की तौफ़ीक दे।

http://readingandspelling.com/educational-therapy रमज़ान या रमदान
रमज़ान या रमदान सिर्फ तलफ़्फ़ुज़ (उच्चारण) का फ़र्क़ है.
अरबी भाषा में ‘ज़्वाद’ अक्षर का स्वर अंग्रेज़ी के ‘ज़ेड’ के बजाए ‘डीएच’ की संयुक्त ध्वनि होता है. इसीलिए अरबी में इसे रमदान कहते हैं जबकि उर्दू में आमतौर पर इसे रमज़ान कहते हैं.भारत उपमहाद्वीप में तो रमज़ान ही कहा जाता रहा है.माहे रमज़ान शब्द ‘रम्ज़’ से लिया गया है, जिसका अर्थ होता है- “छोटे पत्थरों पर पड़ने वाली सूर्य की अत्याधिक गर्मी”। माहे रमज़ान ईश्वरीय नामों में से एक नाम है।रमज़ान के महीने में अल्लाह की तरफ़ से हज़रत मोहम्मद साहब सल्लहो अलहै व सल्लम पर क़ुरान शरीफ़ नाज़िल हुआ था।

http://mimacleaning.com/write-a-paper-the-night-before पाँच फ़र्ज़
अल्लाह ने अपने बंदों पर जो पाँच चीज़ें फ़र्ज़ की हैं…इन्हें इस्लाम के ख़ास ‘सुतून'(स्तम्भ) कहते हैं
1. कलिमा-ए-तयैबा यानी ‘ला इलाहा इलल ला मोहम्‍मदुर रसूलुल्‍लाह।’
2.नमाज़
3. हज
4.रोज़ा
5.ज़कात

अल्लाह के इनाम की बारिश
रमज़ान की कई फज़ीलत हैं। इस माह में नवाफ़िल का सवाब सुन्नतों के बराबर और हर सुन्नत का सवाब फ़र्ज़ के बराबर और हर फ़र्ज़ का सवाब 70 फ़र्ज़ के बराबर कर दिया जाता है। इस माह में हर नेकी पर 70 नेकी का सवाब होता। इस माह में अल्लाह के इनामों की बारिश होती है।

इबादत
इस महीने में शैतान को क़ैद कर दिया जाता है, ताकि वह अल्लाह के बंदों की इबादत में खलल न डाल सके। इस पूरे माह में रोज़े रखे जाते हैं और इस दौरान इशा की नमाज़ के साथ 20 रकत नमाज़ में क़ुरआन मजीद सुना जाता है, जिसे तरावीह कहते हैं। इस महीने में आकाश तथा स्वर्ग के द्वार खुल जाते हैं तथा नरक के द्वार बंद हो जाते हैं। इस महीने की एक रात की उपासना, जिसे ‘शबे क़द्र’ के नाम से जाना जाता है, एक हज़ार महीनों की उपासना से बढ़ कर है। इस महीने में रोज़ा रखने वाले का कर्तव्य, ईश्वर की अधिक से अधिक प्रार्थना करना है।

सेहरी

रोज़े रखने के लिए सब से पहले सेहरी खाया जाए क्योंकि सेहरी खाने में बरकत है, सेहरी कहते हैं सुबह सादिक़ या भोर से पहले रोज़ा रखने की नीयत से खा लिया जाए। रसूल मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमाया, ‘सेहरी खाओ क्यों कि सेहरी खाने में बरकत है।’ एक दूसरी हदीस में आया है, ‘सेहरी खाओ चाहे एक घूँट पानी ही पी लो.’

रोज़ा इफ़्तार
भूखे को खाना खिलाना भी बहुत बड़ा पुण्य है और जिसने किसी भूखे को खिलाया और पिलाया अल्लाह उसे जन्नत के फल खिलाएगा और जन्नत के नहर से पिलाएगा. जो रोज़ेदार को इफ़्तार कराएगा तो उसे रोज़ेदार के बराबर सवाब (पुण्य) मिलेगा और दोनों के सवाब में कमी न होगी जैसा कि रसूल मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का फरमान है ‘जिसने किसी रोज़ेदार को इफ़्तार कराया तो उसे रोज़ेदार के बराबर सवाब (पुण्य) प्राप्त होगा मगर रोज़ेदार के सवाब में कु्छ भी कमी न होगी.

Please follow and like us:

Leave a Reply