डॉक्टर अतीक सिद्दीकी की नई किताब: ‘हिंदुस्तानी विरासत और आसारे क़दीमा’

देश के जाने माने लेखक डॉ. अतीक अनवर सिद्दीकी लंबे समय तक पुरातत्व विभाग में उच्च पद पर रहे हैं और सेवा मुक्त हुए भी काफी समय बीत गया लेकिन उनकी सक्रियता अनंत है। आपके विशेष विषय भारतीय सभ्यता, विरासत और पुरातात्विक हैं। इस तरह आपके पास काफी गहरा अनुभव है, यह किताब उसी का एक छोटा सा आईना है। पहली बार जब इस किताब को अंग्रेजी में लिखा तो उन्हें यह एहसास हुआ इसे उर्दू में भी होना चाहिए।’हिंदुस्तानी विरासत और आसारे क़दीमा’ (भारतीय विरासत और पुरातात्विक) में अलग शीर्षकों के अंतर्गत बहुत कुछ अलग और विशेष लिखने की कोशिश की है.
‘हिंदुस्तानी विरासत और आसारे क़दीमा’ डॉक्टर सिद्दीकी के शौध की ऐसी दिलचस्प किताब है जिसे पढ़कर पाठकों की जानकारी और वृद्धि तो होती ही है लेकिन एक दिली सुकून भी मिलता है। किताब का लेखन एकदम पारदर्शी और सरल है. शौध और जानकारी के साथ किताब की उपयोगिता पर विशेष ध्यान दिया गया है। साथ ही इस शोध पुस्तक की गुणवत्ता और स्तर बना रहे इस बात पर भी ज़ोर दिया गया है। लेखक ने उन विषयों पर लिखा है जो जिस पर अव्वल तो कुछ लिखा ही नहीं गया और लिखा भी है तो बहुत कम। डॉक्टर सिद्दीकी ने पाठकों को खुश करने के लिए अपने हर विषय को सलीके और कुशलता से लिखा है, इसमें किसी भी तरह की कोताही बतौर लेखक नहीं बरती गई है, ताकि किताब में रुचि और निरंतरता बनी रहे. पाठकों की सुविधाओं के लिए अलग अलग विषय को विभिन्न शीर्षकों के साथ लिखा है। किताब के पन्ने हवा के झोंकों की तरह पलटते जाते हैं और पाठक को थोड़ी सी भी बोरियत नहीं होती है।
किताब में डॉक्टर सिद्दीकी ने फतहपुर सीकरी, ताज महल, साँची के स्तूप, अजंता एलोरा, गोवा के गिरजा घर, लाल किले, खजूराहो, हंस्तिनपुर, लखनऊ, रामपुर, सारनाथ और सालार जंग संग्रहालय, हज़रत राबिया बसरी,टीपू सुल्तान, कोहेनूर का उल्लेख किया है।
साढ़े पांच सौ पन्नों की एक ज़खीम किताब जिसका मूल्य केवल दो सौ रुपये है. किताब को तख़लीक़कर पब्लिशर्स अनीस अमरोही ने प्रकाशित है।
यह किताब हर वर्ग के लिए है जिसमें न केवल इतिहास, संस्कृति और पुरातत्व महत्वपूर्ण विषयों का दस्तावेज़ है बल्कि भारतीय संयुक्त संस्कृति को समझने और समझाने के लिए भी विश्वसनीय किताब है।
डॉक्टर सिद्दीकी को अरबी, फारसी, बंगाली, तुर्की और अंग्रेजी भाषा के प्रकांड जानकार हैं. उन्होंने मध्य एशिया के इतिहास का गहराई से अध्ययन किया है। भारतीय इस्लामी कला और स्थापत्य कला के विशेषज्ञ के रूप में भी संयुक्त अरब अमीरात, रूस, जर्मनी, फ्रांस, सऊदी अरब, तुर्कमेनिस्तान और चेकोस्लोवाकिया की भी यात्राएं कर चुके हैं। पुरातत्व विभाग में दौराने नौकरी दिल्ली के राष्ट्रीय संग्रहालय लाल किला और आगरा के अलावा भुवनेश्वर, चंडीगढ़ और भोपाल में भारतीय सर्वेक्षण ऑफ इंडिया के विभिन्न पदों पर रहे. 2010 में सरकारी नौकरी से रिटायर होने के बाद लखनऊ में रहते हुए देश के कई संगठनों के सलाहकार हैं। अंग्रेजी में तो कई किताबें लिख चुके हैं। उर्दू में यह उनकी तीसरी किताब है।

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