यादों के दायरों में हमेशा रहेंगे आदिल क़ुरैशी

रफ़ीक़ विसाल खान
अब ये एक बेलिबास हक़ीक़त है कि आदिल भाई नहीं रहे इसे अंदर से क़ुबूल करने में बरसों लग जाएंगे यानी साँसों की आख़री गिरह
जब लगेगी तब ये सिलसिले ख़त्म न होकर ट्रांसफर हो जाएं किसी रूह में.यानी आदिल क़ुरैशी कुछ ऐसी ही बेमिसाल शख़्सीयत के मालिक थे.उनकी बातें,उनकी यादें उनके क़िस्से दोस्तों,अज़ीज़ों,रिश्तेदारों के तज़किरों में हमेशा शफ़्फ़ाफ़ नदी की तरह बहते रहेंगे.

उनसे मिलने और बिछड़ने के दर्द का अहसास उनके जानने वाले बेशुमार ज़हनो-दिल हमेशा महसूस करते रहेंगें.मुझे याद है जब इंदौर से ट्रांसफर (नौकरी) होकर जब गोवा जा रहे थे तो इंदौर के दोस्तों-अज़ीज़ों को गहरा दुःख हुआ था और पल पल उनके ज़िक्र होते थे और वे भी छुट्टी ले लेकर इंदौर आ जाते थे दोस्तों से मिलने.इंदौर की इसी मुहब्बत में ट्रांसफर वाली नौकरी को खैरबाद कह दिया और फिर वो हमेशा हमेशा के लिए इंदौर के होकर रह गए.

यानी जो इंदौर ज़िंदा दिल दोस्त की दूसरे जाने की जुदाई बर्दाश्त नहीं कर सकता था,इस जहाँ से जाने की हक़ीक़त कैसे महसूस कर रहे होंगे…दिल्ली में रहकर इस दर्द का अहसास मुझे भी है.दिल में एक तड़प है कुछ ज़ाती,कुछ वक़्त की मजबूरियां हैं कि मैं उनके आख़िरी सफ़र से महरूम रहा.उनकी कल्चरल काविशों -मुहब्बतों के क़िस्से बहुत हैं और इंदौर में रंगमंच की रफ़्तार नहीं थमने की उनकी जो कोशिशें थीं वो आख़िर तक क़ायम रहीं.पत्रकारिता में उनका योगदान कुछ कम नहीं था और उस पर कुछ लिखा जाना बाक़ी है.

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