पीर हाजी रतन सिंह हिंदी

पीर हाजी रतन की मज़ार बठिंडा के लोकप्रिय धार्मिक स्थलों में से एक हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार बाबा हाजी रतन ने राजा भोज के राजदूत के रूप में मक्का का दौरा किया था । जब वे भारत लौटे तो वे बठिंडा में रुके और ध्यान किया । मज़ार के पास एक गुरुद्वारा है, जहाँ मस्जिद और गुरूद्वारे की एक ही दीवार हैं। इसी धार्मिक समानता और निष्पक्षता को देखने के लिए पर्यटक यहाँ दूर-दूर से आते हैं।

बाबा हाजी रतन सिंह हिंदी का जन्म उत्तर प्रदेश के बिजनौर के एक गांव में हुआ था लेकिन जन्म तारीख नहीं मिलती.लेकिन हज़रत बाबा रतन हिंदी का इंतक़ाल दिल्ली और सिंध के बीच में ‘ताबर हिन्द’ (भटिंडा का पुराना नाम) में 1234 में हुआ था.

बाबा रतन हिंदी एक कारोबारी थे और कारोबार के सिलसिले में अरब और मिस्र अक्सर जाना होता था.आपने काफी समय पैगम्बर हज़रत मुहम्मद के साथ गुज़ारा था.जानकारों के मुताबिक़ रतन हिंदी जब मदीना में थे तब उन्होंने तेज़ बारिश के दौरान एक चौदह साल के बच्चे को भेड़ें चराते हुए देखा.उसकी तमाम भेड़ें तो बरसाती नाले से उस पार चली गईं लेकिन खूबसूरत नौजवान कैसे नाला पार करे सोच रहा था तभी रतन हिंदी ने उस बच्चे को अपने काँधे पर बैठकर पानी के नाले के उस पार पहुंचा दिया

उस बच्चे ने शुक्रिया अदा करते हुए दुआ दी. अरबी भाषा में कहा,’तुम्हारी उम्र दराज़ हो..’ ये जुमला सात बार बोला.रतन हिंदी इस घटना के बाद भारत लौट आए. तक़रीबन पचास साल बाद एक रात वे उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ ज़िले के जेवर नामक स्थान पर अपने साथियों के साथ रात में बैठे थे तभी देखा चाँद के दो टुकड़े हो गए और कुछ देर के लिए अन्धेरा सा बरपा हो गया था .फिर वैसा ही जुड़ गया.यही करिश्मा मालवा के राजा भोज ने भी देखा.राजाभोज ने अपने कुछ साथियों को हजरत रतन हिंदी के साथ अरब के मदीना शहर भेजा.वहां जाकर पता चला के इस्लाम के आखिरी पैगम्बर मुहम्मद ने मदीने के कुछ लोगों के कहने पर पल भर के लिए ऐसा किया था.

रतन हिंदी और राजा भोज के नुमाइंदे जब पैगम्बर मुहम्मद से मिले तो उनकी खूबसूरती देखकर दंग रह गए.फिर भी रतन हिंदी जो कि मिस्र यात्रा के दौरान ईसाई हो चुकेथे,उन्होंने आज़माने के लिए पूछा हमें भी कोई करिश्मा दिखाएं कि यक़ीन हो जाए..

.पैगम्बर ने कहा रतन हिंदी भूल गए मुझे अपने काँधे पर बैठकर बरसाती नाला पार कराया था. कुछ समय पैगम्बर साहब के साथ रहने के बाद रतन हिंदी ईसाई से मुस्लिम हो गए और उनके दीगर साथी भी ईमान ले आए.अरब से आने के बाद रतन हिंदी बरसों इस्लाम की तब्लीग़ (प्रचार) करते रहे और आखरी समय पंजाब के भटिंडा में गुज़ारा और यहीं पुराना शहर भटिंडा के अनाज बाजार सिविल अस्पताल के पास रतन हिंदी का मक़बरा है. पीर बाबा रतन हिंदी का मकबरा और गुरुद्वारा एक ही परिसर में हैं.

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दिल्ली में श्रीश्री ठाकुर अनुकूल चंद्र का 130 वां जन्मोत्सव

दिल्ली.युग गुरु, युग पुरुष श्रीश्री ठाकुर अनुकूल चंद्र का 130 वां जन्मोत्सव अनंत भक्त श्री जतिन्द्र नाथ महंती, सचिव सत्संग विहार दिल्ली के मार्गदर्शन में 25 फरवरी को मनाया जाएगा.वरिष्ठ गुरु भाई और आयोजन समिति के सदस्य शंकर डे ने बताया कि 30 वें वार्षिक उत्सव पर पुरुषोत्तम श्री श्री ठाकुर अनुकूल चंद्र के सभी कार्यक्रम रविवार को सुबह 6 बजे से रात 8 बजे तक डीडीए गोल पार्क सेक्टर-A पॉकेट-A, वसंतकुंज,नईदिल्ली में होंगे.इस महोत्सव में वेद मांगलिक,प्रणाम प्रार्थना,संगीतांजलि,पुरुषोत्तम श्री श्री ठाकुर अनुकूल चंद्र के दिव्य जीवन और संदेशों पर उदबोधन भी होंगे.साथ ही सभी भक्तों के लिए दोपहर-शाम प्रसाद सेवा (भंडारा) का भी आयोजन रखा गया है. इस अवसर पर मेहरौली पार्षद आरती सिंह, अध्यक्ष सांस्कृतिक सेल भाजपा रुबी यादव, दिल्ली प्रदेश भाजपा के सचिव गजेंद्र सिंह यादव भी पुरुषोत्तम श्री श्री ठाकुर अनुकूल चंद्र के आशीर्वचन लेने के लिए उपस्थित होंगे.आयोजन समिति के सदस्य श्यामल गंगुली, कल्याण चक्रवर्ती, महेश्वर दास, मिलन चक्रवर्ती भी इस दिव्य आयोजन में उपस्थित रहेंगे.वरिष्ठ गुरु भाई शंकर डे ने सभी भक्तों से आग्रह किया हैकि इस महोत्सव में अवश्य पधारें.
प्रोग्राम: प्रात:-6.00 वेद मांगलिक,6.10 उषा कीर्तन,6.58 प्रणाम-प्रार्थना,10.30 संगीतांजलि,11.30 उत्सव आरम्भ युग गुरु, युग पुरुष श्रीश्री ठाकुर अनुकूल चंद्र के दिव्य जीवन व सन्देश पर उदबोधन, दोपहर1.30 बजे प्रसाद सेवा (भंडारा),2.00सांस्कृतिक कार्यक्रम,3.30 मैत्री सम्मेलन,शाम 5.00 शिक्षण बैठक/मेडिकल कांफ्रेंस,6.10 प्रणाम-सांध्य प्रार्थना,7.00 सांस्कृतिक कार्यक्रम/ नॉर्थ इंडिया वर्कर्स कांफ्रेंस,8.00 प्रसाद सेवा(भंडारा ).

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अल्पसंख्यक मंत्रालय को झटका,बिना मेहरम के हज की अनुमति नहीं

दिल्ली. कुछ समय पहले अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय ने नई हज नीति के चलते मोदी सरकार तीन तलाक के बाद अब मुस्लिम महिलाओं को एक और तोहफा दिया था कि मोदी सरकार की नई हज नीति के तहत मुस्लिम महिलाएं बिना किसी मेहरम (पति, पिता या भाई) के भी स्वतंत्र रूप से हज यात्रा कर सकेंगी.

भारत यात्रा पर आए सऊदी अरब स्थित हरम मक्की के मुफ़्ती प्रोफेसर डॉ वसीउल्लाह अब्बास ने इंकार करते हुए कहा है कि मेहरम के बगैर औरतों का हजयात्रा पर जाना नाजायज़ है. मुफ़्ती ने स्पष्ट करते हुए कहा कि औरत चाहे कितनी ही बूढी क्यों न हो जाए, हजयात्रा के लिए मेहरम साथ होना जरूरी है.

मुफ़्ती वसीउल्लाह अब्बास भारत के दौरे पर 

हरम मक्की के मुफ़्ती प्रोफेसर डॉ वसीउल्लाह अब्बास जमीअत अलअरबिया अलहिंद की निमन्त्रण पर औरंगाबाद के दौरे पर आए हैं.उसने मीडिया से बातचीत करते हुए यह कहा कि सऊदी सरकर ने मेहरम के बगैर हजयात्रा की इजाजत नहीं दी है. मुफ्ती हरम के बयान से यह मामला उलझ गया है. अब यह देखना दिलचस्प होगा कि भाजपा सरकार मुफ्ती हरम के बयान पर कैसी प्रतिक्रिया देती है.

नई हज नीति में किया था बदलाव

उल्लेखनीय है कि भारत सरकार के अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय की ओर से पिछले दिनों हज पालिसी में बदलाव करते हुए ऐलान किया गया था कि 45 साल से ज्यादा की उम्र की औरतें चार के ग्रुप में बगैर किसी मेहरम के हज पर जा सकती हैं।अभी तक कोई भी मुस्लिम महिला अपने खून के रिश्ते वाले रिश्तेदार के बिना हज पर नहीं जा सकती थी। सऊदी अरब भी 45 और इससे अधिक उम्र की महिलाओं को हज के लिए प्रवेश की अनुमति देता है.

भारत के आलिमों ने कहा था

जब भारत के आलिमों ने इसे गैर-शरइ बताया तो उन्हें औरतों की आज़ादी और तरक्की का विरोधी बतलाया गया. इस मामले में केन्द्रीय मंत्री मुख़्तार अब्बास नकवी ने खुलासा किया था कि अन्य देशों की महिलाएं भी इस तरह हज कर रही हैं और सऊदी सरकार ने खुद इस की पहल की है.बता दें कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर अमल करते हुए नई हज नीति में सब्सिडी की व्यवस्था खत्म करने को भी हरी झंडी दे दी है।

हज रवानगी सेंटर

इस नई नीति में हज यात्रियों को देश में बेहतर सुविधाएं देने पर जोर दिया गया है. इसके लिए हज रवानगी स्थलों की संख्या 21 से घटाकर नौ की जाएगी. इनमें दिल्ली, लखनऊ, कोलकाता, अहमदाबाद, मुंबई, चेन्नई, हैदराबाद, बेंगलुर और कोच्चि शामिल हैं.इन जगहों पर सरकार अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस हज हाऊस का निर्माण करेगी. जो प्रस्थान स्थल इस सूची से बाहर हैं. वहां हज यात्रियों के लिए बनी सुविधाओं का इस्तेमाल शैक्षिक गतिविधियों के लिए किया जाएगा.

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महरौली में शुक्रवार को MABA का महानवमी उत्सव मनाया जाएगा

दिल्ली. महरौली आनंदमयी बंगाली एसोसिएशन (MABA) के तत्वावधान में शारदीय दुर्गा पूजा का हर साल आयोजन किया जाता है. जिसमें दिल्ली और विदेशों में रहने वाले सदस्य भी तन मन से शामिल होते हैं.एसोसिएशन के अध्यक्ष शंकर डे ने बताया कि इस साल ये भव्य पूजा उत्सव महरौली की अग्रवाल धर्मशाला, वार्ड नहीं -8 में २६ से २९ सितम्बर तक मनाया जा रहा है. 29 सितंबर 2017 को महानवमी पर्व मनाया जाएगा.शाम 8:00 बजे होने वाले इस समारोह में फेमस फोटोग्राफर,लेखक रघु रॉय विशेष अतिथि होंगे और श्री रॉय सम्भोधित भी करेंगें.रात 9:00 बजे श्रीमती यूनिवर्स एशिया रूबी यादव भी शिरकत करेंगीं और आनंदमयी बंगाली एसोसिएशन के सदस्यों से मिलेंगीं.

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चांद नज़र नहीं आया, रविवार को होगा पहला रोज़ा

सऊदी अरब में रमजान का महीना शनिवार से शुरू

दिल्ली.शिया चाँद समिति के अध्यक्ष मौलाना सैफ़ अब्बास और मरकज़ी चाँद समिति के अध्यक्ष मौलाना खालिद रशीद फिरहंगीमहली ने चाँद न दिखने की तस्दीक़ की है. रमज़ान माह की पहली तारीख 28 मई को होगी.ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के उपाध्यक्ष डॉ. कल्बे सादिक़ ने कुछ दिन पहले एक बयान में कहा था कि 28 मई को रमज़ान की पहली तारीख होगी और इस तरह ईद 26 जून को मनाई जाएगी. सऊदी अरब में रमजान का महीना शनिवार से शुरू होगा. इस हिसाब से देखें तो हिन्दुस्तान में पहला रोज़ा 28 मई से रखा जाएगा.रमजान नौवां महीना है। ये बरकतों और फजीलतों का महीना है. इसी माह-ए-मुबारक में आसमानी किताब कुरआन नाज़िल हुई थी।तौरेत, जुबूर, इंजील और दूसरी आसमानी किताबें भी इसी माह-ए-मुबारक में उतारी गईं। रमजान महीने का कुरान-ए-मुकददस से गहरा रिश्ता है.
हदीस शरीफ में है कि रमजान में ही हजरत मोहम्मद मुस्तफा सल्लललाहो अलैहे वसल्लम अपने सहाबियों के साथ कुरआन-ए-पाक का दौर (एक-दूसरे को कुरआन सुनाना) किया करते थे.माना जाता है कि रमजान के पाक महीने में जन्नत के दरवाजे खोल दिए जाते हैं। इसलिए इस माह में किए गए अच्छे कामों का सवाब कई गुना ज्यादा बढ़ जाता है और ऊपर वाला अपने बंदों के अच्छे कामों पर नज़र करता है। उनसे खुश होता है।
कहते हैं कि माहे रमज़ान में दोज़ख़ यानी नर्क के दरवाजे बंद कर दिए जाते हैं। रमजान में अल्लाह से अपने सभी गुनाहों की माफी मांगी जाती है। महीने भर तौबा के साथ इबादतें की जाती हैं और माहे रमजान में नफिल नमाजों का सवाब फर्ज के बराबर माना जाता है। साथ ही फर्ज़ नमाजों का सवाब बढ़ जाता है।
रोज़े का मक़सद
रोज़े को अरबी में सोम कहते हैं, जिसका मतलब है रुकना। रोज़ा यानी तमाम बुराइयों से रुकना या परहेज़ करना। ज़बान से ग़लत या बुरा नहीं बोलना, आँख से ग़लत नहीं देखना, कान से ग़लत नहीं सुनना, हाथ-पैर तथा शरीर के अन्य हिस्सों से कोई नाजायज़ अमल नहीं करना। किसी को भला बुरा नहीं कहना। हर वक़्त ख़ुदा की इबादत करना।रोज़े का असल मक़सद है कि बंदा अपनी ज़िन्दगी में तक्वा ले आए। वह अल्लाह की इबादत करे और अपने नेक आमाल और हुस्ने सुलूक से पूरी इंसानियत को फ़ायदा पहुँचाए। अल्लाह हमें कहने-सुनने से ज़्यादा अमल की तौफ़ीक दे।

रमज़ान या रमदान
रमज़ान या रमदान सिर्फ तलफ़्फ़ुज़ (उच्चारण) का फ़र्क़ है.
अरबी भाषा में ‘ज़्वाद’ अक्षर का स्वर अंग्रेज़ी के ‘ज़ेड’ के बजाए ‘डीएच’ की संयुक्त ध्वनि होता है. इसीलिए अरबी में इसे रमदान कहते हैं जबकि उर्दू में आमतौर पर इसे रमज़ान कहते हैं.भारत उपमहाद्वीप में तो रमज़ान ही कहा जाता रहा है.माहे रमज़ान शब्द ‘रम्ज़’ से लिया गया है, जिसका अर्थ होता है- “छोटे पत्थरों पर पड़ने वाली सूर्य की अत्याधिक गर्मी”। माहे रमज़ान ईश्वरीय नामों में से एक नाम है।रमज़ान के महीने में अल्लाह की तरफ़ से हज़रत मोहम्मद साहब सल्लहो अलहै व सल्लम पर क़ुरान शरीफ़ नाज़िल हुआ था।

पाँच फ़र्ज़
अल्लाह ने अपने बंदों पर जो पाँच चीज़ें फ़र्ज़ की हैं…इन्हें इस्लाम के ख़ास ‘सुतून'(स्तम्भ) कहते हैं
1.कलिमा-ए-तयैबा यानी ‘ला इलाहा इलल ला मोहम्‍मदुर रसूलुल्‍लाह।’
2.नमाज़
3. हज
4.रोज़ा
5.ज़कात

अल्लाह के इनाम की बारिश
रमज़ान की कई फज़ीलत हैं। इस माह में नवाफ़िल का सवाब सुन्नतों के बराबर और हर सुन्नत का सवाब फ़र्ज़ के बराबर और हर फ़र्ज़ का सवाब 70 फ़र्ज़ के बराबर कर दिया जाता है। इस माह में हर नेकी पर 70 नेकी का सवाब होता। इस माह में अल्लाह के इनामों की बारिश होती है।

इबादत
इस महीने में शैतान को क़ैद कर दिया जाता है, ताकि वह अल्लाह के बंदों की इबादत में खलल न डाल सके। इस पूरे माह में रोज़े रखे जाते हैं और इस दौरान इशा की नमाज़ के साथ 20 रकत नमाज़ में क़ुरआन मजीद सुना जाता है, जिसे तरावीह कहते हैं। इस महीने में आकाश तथा स्वर्ग के द्वार खुल जाते हैं तथा नरक के द्वार बंद हो जाते हैं। इस महीने की एक रात की उपासना, जिसे ‘शबे क़द्र’ के नाम से जाना जाता है, एक हज़ार महीनों की उपासना से बढ़ कर है। इस महीने में रोज़ा रखने वाले का कर्तव्य, ईश्वर की अधिक से अधिक प्रार्थना करना है।

सेहरी

रोज़े रखने के लिए सब से पहले सेहरी खाया जाए क्योंकि सेहरी खाने में बरकत है, सेहरी कहते हैं सुबह सादिक़ या भोर से पहले रोज़ा रखने की नीयत से खा लिया जाए। रसूल मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमाया, ‘सेहरी खाओ क्यों कि सेहरी खाने में बरकत है।’ एक दूसरी हदीस में आया है, ‘सेहरी खाओ चाहे एक घूँट पानी ही पी लो.’

रोज़ा इफ़्तार
भूखे को खाना खिलाना भी बहुत बड़ा पुण्य है और जिसने किसी भूखे को खिलाया और पिलाया अल्लाह उसे जन्नत के फल खिलाएगा और जन्नत के नहर से पिलाएगा. जो रोज़ेदार को इफ़्तार कराएगा तो उसे रोज़ेदार के बराबर सवाब (पुण्य) मिलेगा और दोनों के सवाब में कमी न होगी जैसा कि रसूल मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का फरमान है ‘जिसने किसी रोज़ेदार को इफ़्तार कराया तो उसे रोज़ेदार के बराबर सवाब (पुण्य) प्राप्त होगा मगर रोज़ेदार के सवाब में कु्छ भी कमी न होगी.

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जहाँ मर कर भी शहीद देता हैं देश भक्ति का सबूत

  और कैसे दे… देश को…? देश भक्ति का सबूत

》परवीन अर्शी 

कहानी हैं एक ऐसे   सैनिक की जो मरने के बाद भी 49 वर्षों से सरहद की कर रहा है सुरक्षा. यह काहानी है बाबा हरभजनसिंह की जो भारतीय सेना में एक सैनिक थे.  हरभजन सिंह का जन्म 30 अगस्त 1946 को, जिला गुजरावाला हुआ में था जो कि वर्तमान में पाकिस्तान है. हरभजन सिंह 24 वीं पंजाब रेजिमेंट के जवान थे और  1966 में आर्मी में भर्ती  हुए थे. पर मात्र 2 साल की नौकरी करके 1968 में, सिक्किम में, एक हादसे का शिकार हो गए थे. दरअसल एक दिन जब वो नदी पार कर रहे थे तो नदी में बह गए.नदी में बह कर उनका शव काफी आगे निकल गया. दो दिन की तलाशी के बाद भी जब उनका शव नहीं मिला तो उन्होंने खुद अपने एक साथी सैनिक के सपने में आकर अपनी शव की जगह बताई.सवेरे सैनिकों ने बताई गई जगह से हरभजन का शव बरामद कर अंतिम संस्कार किया.हरभजन सिंह के इस चमत्कार के बाद साथी सैनिको कीउनमे आस्था बढ़ गई और उन्होंने उनके बंकर को एक मंदिर का रूप दे दिया.

चीन के खतरे का संकेत 

बाबा हरभजन सिंह  का  मंदिर गंगटोक में जेलेप्ला दर्रे और नाथुला दर्रे के बीच, 13000 फ़ीट की ऊंचाई पर स्थित है.पुराना बंकर वाला मंदिर इससे 1000 फ़ीट ज्यादा ऊंचाई पर स्तिथ है. मंदिर केअंदर बाबा हरभजन सिंह की एक फोटो और उनका सामान रखा है. जहां हर रोज सैकड़ों श्रद्धालु आते हैं. और मन्‍नत मांग के जाते है. बाबा हरभजन के बारे में सैनिको का कहना है की हरभजन सिंह की आत्मा, चीन की तरफ से होने वाले खतरे के बारे में पहले से ही उन्हें बता देती है.और यदि भारतीय सैनिको को चीन के सैनिको का कोई भी मूवमेंट पसंद नहीं आता है तो उसके बारे में वो चीन के सैनिको को भी पहले ही बता देते है ताकि बात ज्यादा नहीं बिगड़े और मिल जुल कर बातचीत से उसका हल निकाल लिया जाए. हम चाहे इसबात  पर यकीं  ना करे पर  चीनी सैनिको का  भी इस पर विश्वास  है  इसलिए भारत और चीन के बीच होने वाली हर फ्लैग मीटिंग में हरभजन सिंह के नाम की एक खाली कुर्सी लगाईं जाती है ताकि वो मीटिंग अटेंड कर सके.

मृत्यु के बाद जारी है ड्यूटी 

बाबा हरभजन सिंह अपनी मृत्यु के बाद से लगातार ही अपनी ड्यूटी देते आ रहे है. इनके लिए उन्हें बाकायदा तनख्वाह भी दी जाती है, उनकी सेना में एक रेंक है, नियमानुसार उनका प्रमोशन भी किया जाता है. यहां तक की उन्हें कुछ साल पहले तक 2 महीने की छुट्टी पर गांव भी भेजा जाता था. इसके लिए ट्रेन में सीट रिज़र्व की जाती थी, तीन सैनिको के साथ उनका सारा सामान उनके गांव भेजा जाता था तथा दो महीने पुरे होने पर फिर वापस सिक्किम लाया जाता था. जिन दो महीने बाबा छुट्टी पर रहते थे उस दरमियान पूरा बॉर्डर हाई अलर्ट पर रहता था क्योकि उस वक़्त सैनिको को बाबा की मदद नहीं मिल पाती थी. अब बारह महीने ड्यूटी पर लेकिन बाबा का सिक्किम से जाना और वापस आना एक धार्मिक आयोजन का रूप लेता जा रहा था जिसमे की बड़ी संख्या में जनता इकठ्ठी होने लगी थी. कुछ लोगो इस आयोजान को अंधविश्वास को बढ़ावा देने वाला मानते थे इसलिए उन्होंने अदालत का दरवाज़ा भी  खटखटाया…क्योंकि सेना में किसी भी प्रकार के अंधविश्वास की कोई जगह नहीं  होती है.

बाबा के मंदिर के पानी से रोग मिट जाते हैं 

मंदिर में बाबा का एक कमरा भी है जिसमे प्रतिदिन सफाई करके बिस्तर लगाए जाते है. बाबा की सेना की वर्दी और जुते रखे जाते है. कहते है की रोज़ पुनः सफाई करने पर उनके जूतों में कीचड़और चद्दर पर सलवटे पाई जाती है.  बाबा हरभजन सिंह का मंदिर सैनिको और लोगो दोनों की ही आस्थाओ का केंद्र है. इस इलाके में आने वाला हर नया सैनिक सबसे पहले बाबा के नमन  करने  आता  है.इस मंदिर को लेकर यहाँ के लोगो में एक अजीब सी मान्यता यह है की यदि इस मंदिर में बोतल में भरकर पानी को तीन दिन के लिए रख दिया जाए तो उस पानी में चमत्कारिक औषधीय गुण आ जाते है. इस पानी को पीने से लोगो के रोग मिट जाते है. इसलिए इस मंदिर में नाम लिखी हुई बोतलों का अम्बार लगा रहता है। यह पानी 21 दिन के अंदर प्रयोग में लाया जाता है और इस दौरान मांसाहार और शराब का सेवन निषेध होता है. आर्मी की देखरेख मे होता हैं  मंदिर का संचालन, बाबा का बंकर, जो की नए मंदिर से 1000 फ़ीट की ऊंचाई पर है, लाल और पीले रंगो से सज़ा है. सीढ़िया लाल रंग की और पिलर पीले रंग के.सीढ़ियों के दोनों साइडरेलिंग पर नीचे से ऊपर तक घंटिया बंधी है.

बाबा के बंकर में कॉपिया राखी है. इन कॉपियों में लोग अपनी मुरादे लिखते है ऐसा माना जाता है की इनमे लिखी गई हर मुराद पूरी होती है. इसी तरह में बंकर में एक ऐसी जगह है जहाँ लोग सिक्के गिराते है यदि वो सिक्का उन्हें वापस मिल जाता है तो वो भाग्यशाली माने जाते है.फिर उसे हमेशा के लिए अपने पर्स या तिजोरी में रखने की सलाह दी जाती है। दोनों जगहों का सम्पूर्ण संचालन आर्मी के द्वारा ही किया जाता है.

 

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इस्लाम में महिलाओं के अधिकार कम नहीं हैं

ज़्यादातर गैर मुस्लिम मानते हैं कि इस्लाम में औरतों को ज़ुल्म सहना पड़ता है. क्या वाकई में ऐसा है ? ये सब कम पढ़े लिखे भारतीय मीडिया की गलत धारणाएं हैं ?

“और औरतों के लिए आदमियों के ऊपर अधिकार है, जैसे आदमियों के औरतों के ऊपर अधिकार हैं” (क़ुरान 2:228)

चौदह सौ साल पहले, इस्लाम ने महिलाओं को वे अधिकार दे चुका है जो पश्चिम में महिलाओं को हाल ही में मिलने शुरू हुए हैं । 1930 में, एनी बेसेंट ने कहा, “ईसाई इंग्लैंड में संपत्ति में महिला के अधिकार को केवल बीस वर्ष पहले ही मान्यता दी गई है, जबकि इस्लाम में हमेशा से इस अधिकार को दिया गया है। यह कहना बेहद गलत है कि इस्लाम उपदेश देता है कि महिलाओं में कोई आत्मा नहीं है ।” (जीवन और मोहम्मद की शिक्षाएं, 1932)

सभी आदमी और औरत एक ही व्यक्ति की संताने हैं – पैगम्बर आदम अलैहिस्सलाम | इस्लाम महिला और पुरुष दोनों के लिए ही इन्साफ और हक की बात करता है |

समान पुरस्कार और बराबर जवाबदेही

इस्लाम में आदमी और औरत एक ही अल्लाह को मानते हैं, उसी की इबादत करते हैं, एक ही किताब पर ईमान लाते हैं | अल्लाह सभी इंसानों को एक जैसी कसौटी पर तौलता है वह भेदभाव नहीं करता | अल्लाह क़ुरान की आयातों में आदमी और औरत के लिए इन्साफ और एक जैसे पुरूस्कार पर जोर देता है:

“अल्लाह ने ईमान वालों, आदमी और औरतों, से वादा किया है, उन बगीचों और महलों का जिन से नदियाँ बहती हैं और उनकी ख़ूबसूरती कभी न ख़त्म होने वाली है |” (कुरान 9:72)

“मैं तुम में से किसी कामगार, आदमी या औरत के काम का नुक्सान न होने दूंगा; तुम एक दुसरे के हो |” (कुरान 3: 195)

इन आयातों से पता चलता है कि इनाम इंसान के लिंग पर निर्भर नहीं है बल्कि उसके द्वारा किये गए काम पर निर्भर करता है |

अगर हम दुसरे मज़हबों से इस्लाम की तुलना करेंगे तब हम देखेंगे की इस्लाम दोनों लिंगों के बीच भी न्याय करता है | उदाहरण के लिए इस्लाम इस बात को ख़ारिज करता है कि माँ हव्वा हराम पेड़ से फल तोड़ कर खाने के लिए ज्यादा ज़िम्मेदार हैं बजाय हज़रत आदम के | इस्लाम के मुताबिक माँ हव्वा और हज़रत आदम दोनों ने गुनाह किया | जिसके लिए दोनों को सजा मिली | जब दोनों को अपने किये पर पछतावा हुआ और उन्होंने माफ़ी मांगी, तब दोनों को माफ़ कर दिया गया |

इल्म हासिल करने का बराबरी का अधिकार

दोनों पुरुषों और महिलाओं को समान रूप से ज्ञान प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। पैगंबर मुहम्मद (सल्ल.) ने कहा है कि:

“शिक्षा हर मुसलमान के लिए अनिवार्य है।”

पैगम्बर मुहम्मद (सल्ल.) के समय पर भी कई मुस्लिम महिला विद्वान् थीं | इनमें से कुछ पैगम्बर के परिवार से थी, कुछ सहाबी और उनकी बेटियां थी | कुछ प्रमुख विद्वान् महिलाओं में हज़रत आयशा, जो पैगम्बर मुहम्मद (सल्ल.) की पत्नी थी, शामिल हैं | इस्लामिक कानून का एक चौथाई हज़रत आयशा के ज़रिये ही आया है |

अन्य कई महिलाएं भी इस्लामिक न्यायशास्त्र की विद्वान् थी और उनके छात्रों में कई महान पुरुष विद्वान् शामिल थे |

जीवनसाथी चुनने का बराबरी का अधिकार

इस्लाम ने औरतों को अपना जीवनसाथी चुनने का अधिकार दिया है और उन्हें शादी के बाद अपने पारिवारिक नाम में भी कोई बदलाव न करने की आज़ादी है | कई लोगों के मन में यह धारणा होती है मुस्लिम माता-पिता जबरदस्ती अपनी बेटियों की शादी करा देते हैं | यह एक सांस्कृतिक प्रथा है इसका इस्लाम से कुछ लेना देना नहीं है | बल्कि इस्लाम में ऐसी जोर-जबरदस्ती की मनाही है |

पैगम्बर मुहम्मद (सल्ल.) के समय पर एक महिला आपके पास आई और कहा कि, “मेरे पिता ने अपना सामाजिक रुतबा बढाने के लिए मेरे चचेरे भाई से शादी करा दी और इस शादी के लिए मुझ पर दबाव बनाया गया |” यह सुनने के बाद पैगम्बर मुहम्मद (सल्ल.) ने उस महिला के पिता को बुलवाया और उसकी मौजूदगी में उसकी बेटी के सामने दो विकल्प रखे | अगर वह चाहे तो इस शादी को ख़त्म कर दे या शादी को अपना ले | महिला ने जवाब दिया, “ ऐ अल्लाह के पैगम्बर मैंने अपने पिता की बात को मान लिया है | लेकिन मैं बाकि महिलाओं को दिखाना चाहती थी कि उन्हें शादी के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता |”

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अजमेर दरगाह दीवान हटाए गए

कल की थी बीफ पर बैन लगाने की मांग

अजमेर। अजमेर दरगाह के दीवान सैय्यद जैनुल अबेदीन अली खान क दीवान पद से हटाया जा रहा है। उनके भाई अलाउद्दीन आलिमी ने उन्हें पद से हटाने का एलान किया है और खुद को दरगाह का दीवान घोषित कर दिया है। बताया जा रहा है कि दीवान के ‘बीफ बैन’ वाले बयान ने उनकी मुश्किले बढ़ा दी और उन्हें दीवान पद से हटाने का फैसला कर लिया।गौरतलब है कि दीवान सैयद जैनुअल अबेदीन अली खान ने दरगाह पर आयोजित 805वें उर्स के समापन के मौके पर जारी बयान में बीफ पर बैन लगाने की मांग की थी। साथ ही ट्रिपल तलाक को भी इस्लाम विरोधी करार दिया था।

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हजरत निजामुद्दीन की ‘माई साहिबा’ की दरगाह!

स्थान:दिल्ली
लोकेशन: हज़रत निजामुद्दीन दरगाह से 10 किलीमीटर
महरौली दरगाह कुतबुद्दीन बख्तियार काकी से 3 किलोमीटर,अरबिंदो मार्ग(आईआईटी दिल्ली के पास),अधचिनी
सज्जादानशीन: सय्यद आसिफ अली निजामी / चीफ इंचार्ज: सय्यद आमिर अली निजामी

 

परवीन अर्शी 

दिल्ली में हजरत निजामुद्दीन की दरगाह का रास्ता तो सबको पता है लेकिन आईआईटी दिल्ली के पास अधचिनी गांव में करीब 780 साल पुरानी उनकी मां और बहन की दरगाह है जहां बदायूं से आने के बाद उनकी मां रहीं थीं और निजामुद्दीन ने यहीं अपनी शुरुआती तालीम हासिल की थी. हज़रत निजामुद्दीन औलिया अपने पिता के इंतकाल के बाद अपनी मां(हजरत बीबी जुलेखा माई साहिबा) के साथ तालीम हासिल करने के लिए दिल्ली आ गए थे.

माई साहिबा दरगाह की नई तस्वीर
माई साहिबा दरगाह की रेनवैशन के पहले की तस्वीर

माई साहिबा ने अधचिनी गांव में ही रिहाइश बनाई थी. सूफी सिलसिले में आने के बाद निजामुद्दीन गयासपुर चले गए जिसे आज हजरत निजामुद्दीन इलाके के नाम से जाना जाता है लेकिन माई साहिबा यहीं पर रहीं। माई साहिबा दरगाह में हर बुधवार को ज़ायरीन बड़ी तादाद में आते हैं और अपनी मुरादें पूरी करते हैं. कहते हैं कि यहां पांच बुध पूरे करने वालों की दिली मुराद करिश्माई ढंग से पांचवें बुध से पहले पूरी हो जातीं हैं.
इसके अलावा हर जुमे को (शुक्रवार) यहां पर लंगर भी खिलाया जाता है.

अरबिंदो मार्ग पर लगा माई साहिबा का बोर्ड

780 साल पुरानी माई साहिबा की इस दरगाह में निजामुद्दीन की बहन हजरत बीबी जैनब और भांजी बीबी  रुकैया  की भी मज़ार है. यहीं  जामा मस्जिद के अंदर सुहारवर्दिया सिलसिले के सबसे मशहूर बुज़ुर्ग हज़रत अबू हफ्स शहाबुद्दीन उमर सुहारवर्दी की बेटियां और माई साहिबा की खिदमतगार बीबी हूर बीबी नूर के मज़ार, यही नहीं चन्द क़दमों की दूरी पर हज़रत बाबा फ़रीद गंजशकर के छोटे भाई शैख़ साहब हज़रत शैख़ नजीबुद्दीन मुतवक्किल और बाबा फ़रीद र.अ. की बेटी बीबी फातिमा का भी मज़ार है.

माई साहिबा की खिदमत कर रहे सज्जादानशीन सय्यद आसिफ अली निजामी और दरगाह कमेटी के चीफ इंचार्ज सय्यद आमिर अली निजामी का कुनबा हज़रत निजामुद्दीन औलिया की बेटी बीबी जैनब की 42वीं पीढ़ी में आते हैं. हजरत निजामुद्दीन और माई साहिबा दरगाह की खिदमत आमिर निज़ामी साहब का खानदान कई पीढ़ियों से कर रहा है. हजरत निजामुद्दीन की दरगाह का तो काफी नाम है और यहां हर मजहब के लोग बड़ी तादाद में पहुंचते हैं।दरगाह की देखभाल करने वाले ट्रस्ट के अन्य सदस्य डॉ. सैयद अहमद अली निजामी माई साहिबा की दरगाह में मुफ्त डिस्पेंसरी चला रहे हैं। यहां पर यूनानी और एलोपैथिक पद्धति से लोगों को मुफ्त इलाज मुहैया कराया जाता है.

हज़रत निजामुद्दीन औलिया र.अ. के परदादा सय्यद अली उज़्बेकिस्तान की मौजूदा राजधानी बुखारा के रहने वाले थे आपके वालिद (पिता) सय्यद अहमद हिंदुस्तान आये थे. आपका सिलसिला हज़रत अली रजि. से मिलता है. आपके परनाना ख्वाजा अरब हुसैन भी सय्यद थे और वे भी बुखार के थे. इसी दौरान बीबी ज़ुलैख़ा से सय्यद अहमद का निकाह हुआ था. बदायूं में हज़रत निजामुद्दीन का जन्म २७ सफर ६३६ हिजरी में हुआ था.
हज़रत निज़ामुद्दीन के वालिद का इंतक़ाल लड़कपन में ही हो गया था,वालिदा बीबी ज़ुलैखा ने छोटे मोटे काम कर बच्चे की परवरिश कर उसके मुस्तक़बिल (भविष्य) के लिए कई सपने देखे और तालीम के लिए बेटे को लेकर दिल्ली आयीं. दिल्ली में उस ज़माने के जाने माने आलिम (स्कॉलर) मौलाना शम्सुद्दीन और मौलाना कमालुद्दीन ज़ाहिद से तालीम दिलवाई.
बीबी ज़ुलैखा दिल्ली के क़रीबी गांव अधचिनी में ही रहीं और हज़रत निज़ामुद्दीन तालीम हासिल करने के लिए दिल्ली में रहे. अधचिनी में माई साहिबा बाबा फ़रीद के छोटे भाई शैख़ साहब (शैख़ नजीबुद्दीन मुतवक्किल) के पड़ोस में ही रहती थीं. उनके साथ ज़रत शहाबुद्दीन उमर सुहारवर्दी की बेटियां बीबी हूर बीबी नूर भी खिदमतगार के तौर पर रहती थीं .

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