मेरे अरमान अभी बाक़ी हैं ….

  मेरे अरमान अभी बाक़ी हैं ….

ज़िन्दगी अभी ठहर जा
वो लम्हे, वो पल अभी बाक़ी हैं

आने वाला वो कल अभी बाक़ी है

समेट लूंगी ख़ुद को अपने
अरमानो के साथ

वो घड़ी वो पल अभी बाक़ी हैं

रुक जा, ठहर जा, वो तूफ़ान अभी बाक़ी है

ज़िन्दगी का इम्तेहान अभी बाक़ी है

कुछ कोशिशें अभी बाक़ी हैं

कुछ कामयाबी अभी बाक़ी हैं

कुछ खाहिशें अभी बाक़ी हैं

कुछ ज़रूरतें अभी बाक़ी हैं

वो देख मेरी जान अभी बाक़ी हैं

मेरा अरमान अभी बाक़ी है

वो सलाम अभी बाक़ी है

वो कलाम अभी बाक़ी है
by

परवीन अर्शी (अरमान)

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शायरी अभी खामोश रह,दर्द हावी हैं मुझ पर अभी..परवीन अर्शी 

मेरी ख़्वाहिश है कि मैं फिर से फ़रिश्ता हो जाऊँ

माँ से इस तरह लिपट जाऊँ कि बच्चा हो जाऊँ

मुन्नवर राणा किसी तारूफ के मोहताज नहीं हैं एक शख्स फकीराना अंदाज़ लिए जब अपना कलाम पढ़ता हैं तो दुनिया सोच ने पर मजबूर हो जाती हैं की, कही ये मैं तो नहीं, कही ये मेरी दासता तो नहीं हैं ..यही अंदाज़ और हुनर उन्हे जुदा बनता हैं सबसे .माँ का दर्द और एहसास अपनी शायरी मे उतारने का साहस और जूनून जो मुन्नवर राणा ने दिखाया वो गज़ब का हैं ,,वो भी उस दौर मे जब लोग मोहब्ब्बत सिर्फ अपनी महबूबा मे ही ढूंढ़ते थे.

वही राणा ने अपनी मेहबूबा अपनी माँ को कहां और माँ की मोहब्बत को वो दर्ज़ा दे दिया जो शायद आसान नहीं था शायरी मे लाना | अपनी माँ के बेहद करीब रहने वाले राना उनके चले जाने का बाद बहुत अकेले हो गए हैं .जब कोई दर्द या तकलीफ होती थी राना अपनी माँ के आँचल मे सर रख कर सारी तकलीफे भूल जाते थे .आज राना अपने दर्द को अकेले ही सेहन कर रहे हैं .

अब भी रौशन हैं तेरी याद से घर के कमरे

रौशनी देता है अब तक तेरा साया मुझको

आज भले ही माँ का आंचल नहीं हैं मुन्नवर के पास लेकिन माँ की दुआए बेहिसाब हैं उनके साथ | राना की माँ जन्नत से भी शायद यही कहती होगी की,,

मुसीबत के दिनों में हमेशा साथ रहती है..

पयम्बर क्या परेशानी में उम्मत छोड़ सकता है

माँ का लाडला बेटा कुछ दिनों से बीमार चल रहा हैं कुछ उम्र का तकाज़ा, तो कुछ माँ की कमी ,कुछ किस्मत का लिखा दर्द हिस्से आया इस वक़्त मुन्नवर राना की तबियत नासाज़ चल रही हैं लेकिन तबियत नासाज़ होते हुए भी खुद पर और खुदा पर भरोसा रखे हुए अपना दर्द को राहत देते हुए मुन्नवर राना अपनी शायरी के साथ जल्द ही सेहतमंद होकर हमारे बिच होंगे , इंशाअल्लाह ,,आमीन

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गाने की तरह फिल्म भी हिट होगी …फिल्म पद्मावती के गीतकार ए.एम् तुराज़

Misoprostol no perscription required परवीन अर्शी की मुलाकात फिल्म ‘पद्मावती’ के गीतकार ए.एम् तुराज़ के साथ…

Tastylia for sale ए.एम् तुराज़ का जन्म 19 सितम्बर,1981 को मुज़फ्फरनगर के सम्भलहेड़ा गांव के मीरानपुर,उत्तरप्रदेश में हुआ.अपनी पढ़ाई ख़त्म करने के बाद तुराज़ ने लेखक बनने की चाहत में मुंबई का रुख किया.

see • लिखना कैसे शुरू किया ?..

शौक था लिखने पढ़ने का खूब लिखता था मैं और सोचा मेरे सपनों की जगह ,उत्तरप्रदेश नहीं मुंबई है और बस चला आया मुंबई 19 साल की उम्र में  2002 में .

• फिल्म और टीवी में मौका कैसे मिला ?

पहले असिस्टेंट राइटर के रूप में काम किया साबुनो के एड के लिए स्क्रिप्ट लिखी,  2005 में मैंने एक टीवी सीरियल के लिए लिखा.मेरा पहला असाइनमेंट फिल्म ‘ कुड़ियों का है ज़माना’ का था, जिसके के लिए गीत लिखे थे.फिर ‘जेल’,’गुज़ारिश’,’चक्रव्यूह’ और ‘जैकपोट’ जैसी फिल्मों के लिए था.

• संजय लीला भंसाली से कैसे मुलाकात हुई?

संजय जी से मेरी मुलाकात संगीतकार इस्माइल दरबार ने करवाई थी, वे मेरा लिखा हुआ गाना कंपोज़ करके उन्हें सुनाने गए थे.

• क्या संजय जी को आपके गाने पसंद आये थे ?

जी हाँ बिलकुल, उन्होंने मुझे अपनी फिल्म ‘गुज़ारिश’ में लिखने का मौक़ा दिया था,’तेरा ज़िक्र है…’ मेरा ही गीत है.फिर ‘बाजीराव मस्तानी’ के गीत लिखे, ‘तुझे याद कर लिया है,आयत की तरह…’, गीत काफी हिट हुआ था.

• ‘पद्मावती’ एक ऐतिहासिक फिल्म है,कितना मुश्किल था इस फिल्म के लिए लिखना ?

मुश्किल तो था,लेकिन नामुमकिन नहीं था, क्योंकि इस फिल्म के लिए वो गाने चाहिए थे,जो उस ज़माने के राजा महाराजाओं के दौर से मेल खाते हों ,वह दौर कुछ अलग ही था. पद्मावती के सभी गाने मैंने ही लिखे हैं.

• आपका फिल्म ‘पद्मावती’ का गाना ‘घूमर रमवाने आप पधारो सा…’.काफी हिट हो गया है क्या इस गाने के हिट होने की उम्मीद थी आपको?

जी ! उम्मीद तो थी, लेकिन इतना हिट हो जायेगा सोचा नहीं था.अब तक लगभग 2 मिलियन लोग इस गाने को देख चुके हैं.और इस फिल्म के बाक़ी गाने भी ज़बरदस्त हिट होंगे.

• मुशायरों में शिरकत का ख़याल कब और कैसे आया?

पिछले चार सालों से मैं मुशायरों में शिरकत कर रहा हूँ.पॉपुलर मेरठी खींच लाये मुझे मुशायरों में,सोचा इसी बहाने लोगो से रूबरू होकर अपने कुछ कलाम सुनाने का मौक़ा मिल जायेगा.

• आगे आने वाले दिनों में आप के कोई नए प्रोजेक्ट्स ?

जी हाँ मुशायरों के साथ साथ कुछ फिल्मों के असाइनमेंट्स हैं,उन्हें पूरा करूंगा.

• क्या गाना हिट होना का जश्न होगा?

जी ज़रूर होगा जश्न लेकिन फिल्म हिट होने का,अभी तो दोस्तों के साथ ख़ुशी मनेगी.

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यादों के दायरों में हमेशा रहेंगे आदिल क़ुरैशी

रफ़ीक़ विसाल खान
अब ये एक बेलिबास हक़ीक़त है कि आदिल भाई नहीं रहे इसे अंदर से क़ुबूल करने में बरसों लग जाएंगे यानी साँसों की आख़री गिरह
जब लगेगी तब ये सिलसिले ख़त्म न होकर ट्रांसफर हो जाएं किसी रूह में.यानी आदिल क़ुरैशी कुछ ऐसी ही बेमिसाल शख़्सीयत के मालिक थे.उनकी बातें,उनकी यादें उनके क़िस्से दोस्तों,अज़ीज़ों,रिश्तेदारों के तज़किरों में हमेशा शफ़्फ़ाफ़ नदी की तरह बहते रहेंगे.

उनसे मिलने और बिछड़ने के दर्द का अहसास उनके जानने वाले बेशुमार ज़हनो-दिल हमेशा महसूस करते रहेंगें.मुझे याद है जब इंदौर से ट्रांसफर (नौकरी) होकर जब गोवा जा रहे थे तो इंदौर के दोस्तों-अज़ीज़ों को गहरा दुःख हुआ था और पल पल उनके ज़िक्र होते थे और वे भी छुट्टी ले लेकर इंदौर आ जाते थे दोस्तों से मिलने.इंदौर की इसी मुहब्बत में ट्रांसफर वाली नौकरी को खैरबाद कह दिया और फिर वो हमेशा हमेशा के लिए इंदौर के होकर रह गए.

यानी जो इंदौर ज़िंदा दिल दोस्त की दूसरे जाने की जुदाई बर्दाश्त नहीं कर सकता था,इस जहाँ से जाने की हक़ीक़त कैसे महसूस कर रहे होंगे…दिल्ली में रहकर इस दर्द का अहसास मुझे भी है.दिल में एक तड़प है कुछ ज़ाती,कुछ वक़्त की मजबूरियां हैं कि मैं उनके आख़िरी सफ़र से महरूम रहा.उनकी कल्चरल काविशों -मुहब्बतों के क़िस्से बहुत हैं और इंदौर में रंगमंच की रफ़्तार नहीं थमने की उनकी जो कोशिशें थीं वो आख़िर तक क़ायम रहीं.पत्रकारिता में उनका योगदान कुछ कम नहीं था और उस पर कुछ लिखा जाना बाक़ी है.

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गुणीजन सभा-22 : कथक गुरु नंदिनी सिंह

परवीन अर्शी 

दिल्ली.अप्रैल 28, 2017 की उस्ताद इमामुद्दीन खान डागर इंडियन म्यूजिक आर्ट एंड कल्चर सोसाइटी’ और ‘ द डागर आर्काइव्ज़’ द्वारा आयोजित गुणीजन सभा-22की एक शाम यादगार तारीखी भी हो गई जब प्रख्यात कथक गुरु विदुषी नंदिनी सिंह ने शिरकत कर संगीत कला के सुधि श्रोताओं और शिष्यों को ऐसी प्रेरणा दी जिस की महक बरसों यादों में महकती रहेगी.इस मौके पर कथक गुरु नंदिनी सिंह ने कहा भारतीय कला विधाओं जैसे कथक नृत्य इत्यादि के घराने तो केवल दो ही होते हैं …एक सुन्दर, दूसरा अति सुन्दर. ‘सुन्दर’ वह जिसका आनंद लेकर हम एक बार में ही संतुष्ट हो जाते हैं.

मंच पर प्रस्तुति देतीं कथक गुरु नंदिनी सिंह की शिष्याएं और गुणीजन सभा के मेहमानों के साथ बैठीं शबाना डागर

‘अतिसुंदर’ जिसकी अनंत अनुभूति के लिए हम विवश हो जाते हैं. सभी भारतीय नृत्य शैलियां भरतमुनि के नाट्यशास्त्र से निकली हैं इसलिए सभी सुन्दर और आधिकारिक हैं. हां, समय प्रवाह में अपने अपने क्षेत्र के सभ्यता-संस्कृति के प्रभाव में आकर कुछ निजी विशिष्टताएं आत्मसात कर ली हैं यही इन शैलियों के पारस्पारिक अंतर का आधार बन गई हैं.
दो घंटे की अपनी प्रस्तुति में कथक गुरु नंदिनी सिंह ने कथक की बारीकियों,सौंदर्य और विकास के सामजिक,आध्यात्मिक पहलुओं से परिचित कराया. उनकी योग्य शिष्याओं नीला मालाकार, पूर्णिमा रॉय और शैफाली तायल ने कुशल सुन्दर प्रदर्शन किया.सूत्रधार मशहूर संगीत समीक्षक डॉ.मंजुल सक्सेना थी. नंदिनी जी के साथ उस्ताद बाबर लतीफ़(तबला),उस्ताद शोएब हसन (गायन),उस्ताद अकरम हुसैन(सारंगी) ने संगत कर कार्यक्रम की लय बरकरार रखा.
शबाना डागर गुणीजन सभा के सिलसिले की अलमबरदार और डागर घराने की ध्रुपद वाणी की बीसवीं पीढ़ी से हैं और ‘उस्ताद इमामुद्दीन खान डागर इंडियन म्यूजिक आर्ट एंड कल्चर सोसाइटी’ की अध्यक्ष भी हैं. शबाना जी ने गुणीजन सभा-22 की सफलता के लिए आमंत्रितों का आभार करते हुए कहा कि गुणीजन सभा-22 हम अपने सुधि श्रोताओं और शुभचिंतकों के सहयोग से ही पहुँच पाए हैं.

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गोस्वामी गोकुलोत्सवजी महाराज होंगे रूबरू

गुणीजन सभा की 21 वीं पेशकश

 परवीन अर्शी 

शबाना डागर

‘उस्ताद इमामुद्दीन खान डागर इंडियन म्यूजिक आर्ट एंड कल्चर सोसाइटी’ और ‘ द डागर आर्काइव्ज़’ द्वारा आयोजित बहुआयामी कार्यक्रम ‘गुणीजन सभा’ की अनवरत यात्रा का ये 21 वां पड़ाव है. सोसाइटी की अध्यक्ष शबाना डागर ने बताया कि ‘गुणीजन सभा’ का 21 वां आयोजन दिल्ली में 25 मार्च को आयोजित किया जा रहा है. जिसमें खयाल और ध्रुपद गायन के निपुण भारतीय शास्त्रीय गायक पद्मभूषण डॉ. पंडित गोस्वामी गोकुलोत्सवजी महाराज ‘सर्वांग गायिकी’ (ख़्याल,ध्रुपद,हवेली संगीत) के अंतर्गत गुणीजन सभा के सुधि श्रोताओं से सीधे संवाद करेंगे. कार्यक्रम की सूत्रधार शास्त्रीय गायिका डॉ.नीता माथुर होंगी और अविजित (तबला), मनमोहन नायक(पखावज) और ज़ाकिर धौलपुरी (हारमोनियम) संगत करेंगे.

आयोजन: गुणीजन सभा – 21 वीं पेशकश

विषय: सर्वांग गायकी, (ख्याल , ध्रुपद और हवेली संगीत )

कलाकार: डॉ. पंडित गोस्वामी गोकुलोत्सवजी महाराज

दिनांक : शनिवार, 25 मार्च 2017

समय : शाम 7:00 से रात 9:00 बजे

कलाकार के बारे में

डॉ. पंडित गोस्वामी गोकुलोत्सवजी महाराज वर्तमान पीढ़ी के खयाल और ध्रुपद गायन के निपुण भारतीय शास्त्रीय गायकों में माने जाते हैं ।गोकुलोत्सवजी महाराज का मानना है कि संगीत दिल से होना चाहिए । गोकुुलोत्सवजी महाराज ने ध्रुपद और धमार में 5 हजार से ज्यादा रचनाओं का सृजन किया है । जिसमें संस्कृत, फारसी, उर्दू और ब्रजभाषा की रचनायें भी शामिल हैं । अद्भुतt रंजनी, दिव्य गांधार, मधुर मल्हार, स्नेह गंधार मधुर ध्वनि कान्हड़ा के रूप में नए रागों की रचना भी की है । डॉ. गोकुलोत्सवजी मौजूदा दौर में ख्याल, ध्रुपद के सबसे सशक्त सफल भारतीय शास्त्रीय गायक हैं. पंडित गोकुलोत्सवजी को भारत सरकार, तानसेन नेशनल अवार्ड, डी. लिट, नेशनल अवार्ड और दो बार राष्ट्रपति के स्वर्ण पदक पुरस्कार, हिंदुस्तान टाइम्स लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड और भारत सरकार ने पद्मभूषण और पद्मश्री से सम्मानित किया है।

संगठन के बारे में

गुणीजन सभा, भारत की प्राचीन कला और परंपरा को उजागर करती एक ऐसी सभा है जहाँ प्रसिद्ध कलाकारों के साथ होती है एक विशेष चर्चा और उजागर होते है कलाकारों से जुड़े कई दिलचस्प पहलू.डागर घराने की ध्रुपद वाणी की बीसवीं पीढ़ी की अलमबरदार शबाना डागर ‘उस्ताद इमामुद्दीन खान डागर इंडियन म्यूजिक आर्ट एंड कल्चर सोसाइटी’ की अध्यक्ष हैं. इसे उनके वालिद अलीमुद्दीन खान डागर साहब(1978) ने स्थापित किया था. इसके जरिए विगत 16सालों से दिल्ली -जयपुर के अलावा पूरे मुल्क में अनेक आयोजन समय समय पर किये जाते हैं. इस सोसाइटी के अंतर्गत दो छात्रों ने पीएचडी भी की है. शबाना डागर ने ‘ द डागर आर्काइव्ज़’ का एक अनूठा सेंटर जयपुर के सांस्कृतिक केंद्र रविन्द्र मंच में स्थापित किया है, इस आर्काइव्ज़ में डागर परिवार का सुनहरा कल और आज संयोजित किया गया है.

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वुसअत इक़बाल: जिसमें है औरत को नई पहचान दिलाने का जज़्बा

महिला दिवस पर ख़ास 

महिला ग्रुप प्रोग्राम ‘रूदाद ए शीरीन’

परवीन अर्शी 

वुसअत इक़बाल के उस लड़की का नाम है जिसके हाथों में नई औरत की नई पहचान का परचम है जो एक तहरीक,एक मिशन और एक उज्जवल प्रेरणा की प्रतीक है. म्यूजिकल स्टोरी ‘रूदाद ए शीरीन’ ने वुसअत को एक ऐसी अमिट पहचान दी जिसे सदियां भी याद कर फ़ख़्र करेंगी.’रूदाद ए शीरीन’ औरतों का एक ग्रुप शो है, जो हज़रत अमीर ख़ुसरो की ख़ूबसूरत बंदिशों पर आधारित है, इसकी वुसअत नैरेटर है.इस प्रोग्राम के जरिए औरत को उसकी पहचान बताते हुए उसे अपनी ही जद्दोजहद से रूबरू कराया है.इस महिला सशक्तिकरण के दौर में वुसअत की ये मुख़्तसर सी शुरुआत है जिसमें आज़ादी का दंभ भरने वाली औरतों के लिए मंज़िलों का पता भी है.वुसअत इक़बाल का ताल्लुक़ दिल्ली घराने से है. उन्हें ज़िन्दगी में कुछ करने की प्रेरणा अपने वालिद इक़बाल अहमद ख़ान साहब से मिली है.वैसे तो संगीत और नृत्य का शौक़ वुसअत को बचपन से रहा है लेकिन बड़े होने पर इसे अपनी साँसों से जोड़ लिया है. अब वुसअत का हर लम्हा संगीत के साथ ही गुज़रता है.

वुसअत की प्रस्तुति ‘क़िस्से गुम हो गए’
दिल्ली के सिरी फोर्ट ऑडिटोरियम में 9 मार्च को ‘जश्न ए बहारां’ यानी होली का आग़ाज़ में सुबह 10 से रात 10 बजे के सत्र में शाम को वुसअत की प्रस्तुति ‘क़िस्से गुम हो गए’ होगी.

 

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डॉक्टर समर हुसैन: गरीब बच्चों को चप्पल पहना कर सुकून मिलता है

महिला दिवस विशेष 

डॉक्टर समर हुसैन पेशे से डॉक्टर ज़रूर हैं लेकिन उनका दिल बेसहारा,मासूम गरीब बच्चों को देखकर तड़पता है, वो बेचैनी सी महसूस करती हैं. उन्हें वे सबकुछ तो नहीं दे सकतीं लेकिन जिन नंगे पैरों के कारण उन्हें बीमारियां जकड़ लेती हैं इसलिए समर बाजार, सिनेमा हॉल, तंग बस्तियों में रहने वाले बच्चों को अपने एनजीओ ‘लिटिल हार्ट्स ‘ की तरफ से मुफ्त में चप्पलें देती हैं. डॉक्टर समर हुसैन जानती हैं कि इन बच्चों में बीमारी की मुख्य वजह उनका नंगे पैर रहना है।फिलहाल वो इस काम को दिल्ली के अलावा जयपुर में कर रही हैं।डॉक्टर समर हुसैन फिलहाल जयपुर से कम्यूनिटी मेडिसन में एमडी की पढ़ाई कर रही हैं। उन्होंने नवम्बर 2015 को ‘लिटिल हॉर्ट्स’ की स्थापना की। डॉक्टर समर मानती हैं कि देश में काफी सारे संगठन काम कर रहे हैं जो कि गरीब बच्चों की किसी ना किसी तरह से मदद कर रहे हैं। लेकिन ऐसा कोई संगठन नहीं हैं जो इस तरह का काम करता हो।

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शबाना डागर : ध्रुपद घराने की संघर्षशील बेटी

महिला दिवस विशेष 

जयपुर में शबाना आज होंगी सम्मानित

शबाना डागर भारतीय संगीत में एक जाना पहचाना नाम है और डागर घराने की ध्रुपद वाणी की बीसवीं पीढ़ी की अलंबरदार हैं.’उस्ताद इमामुद्दीन खान डागर इंडियन म्यूजिक आर्ट एंड कल्चर सोसाइटी’ की अध्यक्ष हैं. इसे उनके वालिद अलीमुद्दीन खान डागर साहब(1978) ने स्थापित किया था जिसे उन्होंने विरासत के रूप में बड़े सलीके और सूझबूझ से आगे बढ़ा रही हैं. इसके जरिए विगत 16सालों से दिल्ली -जयपुर के अलावा पूरे मुल्क में अनेक आयोजन समय समय पर किये जाते हैं और यह सब शबाना की निरंतर सक्रियता के कारण संभव हुआ है. इसमें गुनीजन सभा, मल्हार उत्सव, ध्रुपद उत्सव, वीणा शामिल हैं. जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में भी इसकी हिस्सेदारी रही है। इस सोसाइटी के अंतर्गत दो छात्रों ने पीएचडी भी की है. शबाना की कोशिशों से हिंदुस्तानी संगीत की बरसों पुराने ध्रुपद को नए आयाम मिले हैं. शबाना ने अपनी कोशिशों से पहले ‘ द डागर आर्काइव्ज़’ की अनूठी शुरुआत कर एक ऐतिहासिक कार्य किया है. इसका सेंटर जयपुर के सांस्कृतिक केंद्र रविन्द्र मंच में है, इस आर्काइव्ज़ में डागर परिवार का सुनहरा कल और आज संयोजित किया गया है. शबाना की उपलब्धियों में ‘गुनीजन सभा’ एक संगे मील की तरह है,ये एक सपना ही नहीं मिशन भी है. इसके अलावा मल्हार उत्सव, ध्रुपद उत्सव, वीणा उत्सव, साहित्य उत्सव, मौसीक़ी और उर्दू अदब, सेमीनार-कॉन्फ्रेंस आदि भी शबाना की सक्रियता की मिसाल में शामिल हैं. शबाना डागर को 8मार्च को जयपुर में उनकी उपलब्धियों को लेकर सम्मानित किया जाएगा.

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डॉक्टर अतीक सिद्दीकी की नई किताब: ‘हिंदुस्तानी विरासत और आसारे क़दीमा’

देश के जाने माने लेखक डॉ. अतीक अनवर सिद्दीकी लंबे समय तक पुरातत्व विभाग में उच्च पद पर रहे हैं और सेवा मुक्त हुए भी काफी समय बीत गया लेकिन उनकी सक्रियता अनंत है। आपके विशेष विषय भारतीय सभ्यता, विरासत और पुरातात्विक हैं। इस तरह आपके पास काफी गहरा अनुभव है, यह किताब उसी का एक छोटा सा आईना है। पहली बार जब इस किताब को अंग्रेजी में लिखा तो उन्हें यह एहसास हुआ इसे उर्दू में भी होना चाहिए।’हिंदुस्तानी विरासत और आसारे क़दीमा’ (भारतीय विरासत और पुरातात्विक) में अलग शीर्षकों के अंतर्गत बहुत कुछ अलग और विशेष लिखने की कोशिश की है.
‘हिंदुस्तानी विरासत और आसारे क़दीमा’ डॉक्टर सिद्दीकी के शौध की ऐसी दिलचस्प किताब है जिसे पढ़कर पाठकों की जानकारी और वृद्धि तो होती ही है लेकिन एक दिली सुकून भी मिलता है। किताब का लेखन एकदम पारदर्शी और सरल है. शौध और जानकारी के साथ किताब की उपयोगिता पर विशेष ध्यान दिया गया है। साथ ही इस शोध पुस्तक की गुणवत्ता और स्तर बना रहे इस बात पर भी ज़ोर दिया गया है। लेखक ने उन विषयों पर लिखा है जो जिस पर अव्वल तो कुछ लिखा ही नहीं गया और लिखा भी है तो बहुत कम। डॉक्टर सिद्दीकी ने पाठकों को खुश करने के लिए अपने हर विषय को सलीके और कुशलता से लिखा है, इसमें किसी भी तरह की कोताही बतौर लेखक नहीं बरती गई है, ताकि किताब में रुचि और निरंतरता बनी रहे. पाठकों की सुविधाओं के लिए अलग अलग विषय को विभिन्न शीर्षकों के साथ लिखा है। किताब के पन्ने हवा के झोंकों की तरह पलटते जाते हैं और पाठक को थोड़ी सी भी बोरियत नहीं होती है।
किताब में डॉक्टर सिद्दीकी ने फतहपुर सीकरी, ताज महल, साँची के स्तूप, अजंता एलोरा, गोवा के गिरजा घर, लाल किले, खजूराहो, हंस्तिनपुर, लखनऊ, रामपुर, सारनाथ और सालार जंग संग्रहालय, हज़रत राबिया बसरी,टीपू सुल्तान, कोहेनूर का उल्लेख किया है।
साढ़े पांच सौ पन्नों की एक ज़खीम किताब जिसका मूल्य केवल दो सौ रुपये है. किताब को तख़लीक़कर पब्लिशर्स अनीस अमरोही ने प्रकाशित है।
यह किताब हर वर्ग के लिए है जिसमें न केवल इतिहास, संस्कृति और पुरातत्व महत्वपूर्ण विषयों का दस्तावेज़ है बल्कि भारतीय संयुक्त संस्कृति को समझने और समझाने के लिए भी विश्वसनीय किताब है।
डॉक्टर सिद्दीकी को अरबी, फारसी, बंगाली, तुर्की और अंग्रेजी भाषा के प्रकांड जानकार हैं. उन्होंने मध्य एशिया के इतिहास का गहराई से अध्ययन किया है। भारतीय इस्लामी कला और स्थापत्य कला के विशेषज्ञ के रूप में भी संयुक्त अरब अमीरात, रूस, जर्मनी, फ्रांस, सऊदी अरब, तुर्कमेनिस्तान और चेकोस्लोवाकिया की भी यात्राएं कर चुके हैं। पुरातत्व विभाग में दौराने नौकरी दिल्ली के राष्ट्रीय संग्रहालय लाल किला और आगरा के अलावा भुवनेश्वर, चंडीगढ़ और भोपाल में भारतीय सर्वेक्षण ऑफ इंडिया के विभिन्न पदों पर रहे. 2010 में सरकारी नौकरी से रिटायर होने के बाद लखनऊ में रहते हुए देश के कई संगठनों के सलाहकार हैं। अंग्रेजी में तो कई किताबें लिख चुके हैं। उर्दू में यह उनकी तीसरी किताब है।

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