पीर हाजी रतन सिंह हिंदी

पीर हाजी रतन की मज़ार बठिंडा के लोकप्रिय धार्मिक स्थलों में से एक हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार बाबा हाजी रतन ने राजा भोज के राजदूत के रूप में मक्का का दौरा किया था । जब वे भारत लौटे तो वे बठिंडा में रुके और ध्यान किया । मज़ार के पास एक गुरुद्वारा है, जहाँ मस्जिद और गुरूद्वारे की एक ही दीवार हैं। इसी धार्मिक समानता और निष्पक्षता को देखने के लिए पर्यटक यहाँ दूर-दूर से आते हैं।

बाबा हाजी रतन सिंह हिंदी का जन्म उत्तर प्रदेश के बिजनौर के एक गांव में हुआ था लेकिन जन्म तारीख नहीं मिलती.लेकिन हज़रत बाबा रतन हिंदी का इंतक़ाल दिल्ली और सिंध के बीच में ‘ताबर हिन्द’ (भटिंडा का पुराना नाम) में 1234 में हुआ था.

बाबा रतन हिंदी एक कारोबारी थे और कारोबार के सिलसिले में अरब और मिस्र अक्सर जाना होता था.आपने काफी समय पैगम्बर हज़रत मुहम्मद के साथ गुज़ारा था.जानकारों के मुताबिक़ रतन हिंदी जब मदीना में थे तब उन्होंने तेज़ बारिश के दौरान एक चौदह साल के बच्चे को भेड़ें चराते हुए देखा.उसकी तमाम भेड़ें तो बरसाती नाले से उस पार चली गईं लेकिन खूबसूरत नौजवान कैसे नाला पार करे सोच रहा था तभी रतन हिंदी ने उस बच्चे को अपने काँधे पर बैठकर पानी के नाले के उस पार पहुंचा दिया

उस बच्चे ने शुक्रिया अदा करते हुए दुआ दी. अरबी भाषा में कहा,’तुम्हारी उम्र दराज़ हो..’ ये जुमला सात बार बोला.रतन हिंदी इस घटना के बाद भारत लौट आए. तक़रीबन पचास साल बाद एक रात वे उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ ज़िले के जेवर नामक स्थान पर अपने साथियों के साथ रात में बैठे थे तभी देखा चाँद के दो टुकड़े हो गए और कुछ देर के लिए अन्धेरा सा बरपा हो गया था .फिर वैसा ही जुड़ गया.यही करिश्मा मालवा के राजा भोज ने भी देखा.राजाभोज ने अपने कुछ साथियों को हजरत रतन हिंदी के साथ अरब के मदीना शहर भेजा.वहां जाकर पता चला के इस्लाम के आखिरी पैगम्बर मुहम्मद ने मदीने के कुछ लोगों के कहने पर पल भर के लिए ऐसा किया था.

रतन हिंदी और राजा भोज के नुमाइंदे जब पैगम्बर मुहम्मद से मिले तो उनकी खूबसूरती देखकर दंग रह गए.फिर भी रतन हिंदी जो कि मिस्र यात्रा के दौरान ईसाई हो चुकेथे,उन्होंने आज़माने के लिए पूछा हमें भी कोई करिश्मा दिखाएं कि यक़ीन हो जाए..

.पैगम्बर ने कहा रतन हिंदी भूल गए मुझे अपने काँधे पर बैठकर बरसाती नाला पार कराया था. कुछ समय पैगम्बर साहब के साथ रहने के बाद रतन हिंदी ईसाई से मुस्लिम हो गए और उनके दीगर साथी भी ईमान ले आए.अरब से आने के बाद रतन हिंदी बरसों इस्लाम की तब्लीग़ (प्रचार) करते रहे और आखरी समय पंजाब के भटिंडा में गुज़ारा और यहीं पुराना शहर भटिंडा के अनाज बाजार सिविल अस्पताल के पास रतन हिंदी का मक़बरा है. पीर बाबा रतन हिंदी का मकबरा और गुरुद्वारा एक ही परिसर में हैं.

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