शायरी अभी खामोश रह,दर्द हावी हैं मुझ पर अभी..परवीन अर्शी 

मेरी ख़्वाहिश है कि मैं फिर से फ़रिश्ता हो जाऊँ

माँ से इस तरह लिपट जाऊँ कि बच्चा हो जाऊँ

मुन्नवर राणा किसी तारूफ के मोहताज नहीं हैं एक शख्स फकीराना अंदाज़ लिए जब अपना कलाम पढ़ता हैं तो दुनिया सोच ने पर मजबूर हो जाती हैं की, कही ये मैं तो नहीं, कही ये मेरी दासता तो नहीं हैं ..यही अंदाज़ और हुनर उन्हे जुदा बनता हैं सबसे .माँ का दर्द और एहसास अपनी शायरी मे उतारने का साहस और जूनून जो मुन्नवर राणा ने दिखाया वो गज़ब का हैं ,,वो भी उस दौर मे जब लोग मोहब्ब्बत सिर्फ अपनी महबूबा मे ही ढूंढ़ते थे.

वही राणा ने अपनी मेहबूबा अपनी माँ को कहां और माँ की मोहब्बत को वो दर्ज़ा दे दिया जो शायद आसान नहीं था शायरी मे लाना | अपनी माँ के बेहद करीब रहने वाले राना उनके चले जाने का बाद बहुत अकेले हो गए हैं .जब कोई दर्द या तकलीफ होती थी राना अपनी माँ के आँचल मे सर रख कर सारी तकलीफे भूल जाते थे .आज राना अपने दर्द को अकेले ही सेहन कर रहे हैं .

अब भी रौशन हैं तेरी याद से घर के कमरे

रौशनी देता है अब तक तेरा साया मुझको

आज भले ही माँ का आंचल नहीं हैं मुन्नवर के पास लेकिन माँ की दुआए बेहिसाब हैं उनके साथ | राना की माँ जन्नत से भी शायद यही कहती होगी की,,

मुसीबत के दिनों में हमेशा साथ रहती है..

पयम्बर क्या परेशानी में उम्मत छोड़ सकता है

माँ का लाडला बेटा कुछ दिनों से बीमार चल रहा हैं कुछ उम्र का तकाज़ा, तो कुछ माँ की कमी ,कुछ किस्मत का लिखा दर्द हिस्से आया इस वक़्त मुन्नवर राना की तबियत नासाज़ चल रही हैं लेकिन तबियत नासाज़ होते हुए भी खुद पर और खुदा पर भरोसा रखे हुए अपना दर्द को राहत देते हुए मुन्नवर राना अपनी शायरी के साथ जल्द ही सेहतमंद होकर हमारे बिच होंगे , इंशाअल्लाह ,,आमीन

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